रसूलों पर ईमान

मुह़म्मद बिन सालेह अल-उसैमीन

हमारा ईमान है कि

अल्लाह तआला ने अपनी सृष्टि की ओर रसूलों को भेजा।

“शुभसूचक एवं सचेतकर्ता रसूल बनाकर भेजा, ताकि लोगों के लिए कोई बहाना एवं अभियोग रसूलों के (भेजने के) पश्चात न रह जाये, तथा अल्लाह तआला शक्तिमान एवं पूर्ण ज्ञानी है।

सूरह अन्-निसाः 165

और हमारा ईमान है कि सबसे प्रथम रसूल नूह़ अलैहिस्सलाम तथा अन्तिम रसूल मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं।

“हमने आपकी ओर उसी प्रकार वह़्य भेजी, जिस प्रकार नूह़ एवं उनके बाद के नबियों पर भेजी थी।”

“मुह़म्मद तुम्हारे पुरुषों में से किसी के पिता नहीं हैं, बल्कि अल्लाह के रसूल तथा समस्त नबियों में अन्तिम हैं।”

सूरह अल्-अह़्ज़ाबः 40

और हमारा ईमान है कि

उनमें सबसे अफ़ज़ल (सर्वश्रेष्ठ) मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं, फिर इब्राहीम अलैहिस्सलाम हैं, फिर मूसा अलैहिस्सलाम, फिर नूह़ अलैहिस्सलाम एवं ईसा बिन मर्यम अलैहिस्सलाम हैं। इन्हीं पाँच रसूलों का विशेष रूप से इस आयत में वर्णन हैः

“और जब हमने समस्त नबियों से वचन लिया तथा आपसे तथा नूह़ से तथा इब्राहीम से तथा मूसा से तथा मर्यम के पुत्र ईसा से, और हमने उनसे पक्का वचन लिया।”

सूरह अल्-अह़्ज़ाबः 7

और हमारा अक़ीदा है कि

मर्यादा के साथ विशेषित, उल्लिखित रसूलों की शरीअतों के सारे फ़ज़ायल मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शरीअत में मौजूद हैं। अल्लाह तआला ने फरमाया

“अल्लाह तआला ने तुम्हारे लिए वही धर्म निर्धारित कर दिया है, जिसको स्थापित करने का उसने नूह़ अलैहिस्सलाम को आदेश दिया था, और जो (प्रकाशना के द्वारा) हमने तेरी ओर भेज दिया है तथा जिसका विशेष आदेश हमने इब्राहीम तथा मूसा एवं ईसा (अलैहिमुस्सलाम) को दिया था कि धर्म को स्थापित रखना तथा इसमें फूट न डालना।”

सूरह अश्-शूराः 13

और हमारा ईमान है कि

सभी रसूल मनुष्य तथा सृष्टि थे। उनके अन्दर रुबूबियत (ईश्वरियता) की विशेषताओं में से कोई भी विशेषता नहीं पाई जाती थी। अल्लाह तआला ने प्रथम रसूल नूह़ अलैहिस्सलाम की ओर से सम्बोधन कियाः

“न तो मैं तुमसे यह कहता हूँ कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं, न यह कि मैं परोक्ष जानता हूँ और न यह कहता हूँ कि मैं फ़रिश्ता हूँ।”

सूरह हूदः 31

तथा अल्लाह तआला ने अन्तिम रसूल मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को आदेश दिया कि वह लोगों से कह दें

“न मैं तुमसे यह कहता हूँ कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं, न यह कि मैं परोक्ष जानता हूँ और न ही यह कहता हूँ कि मैं फ़रिश्ता हूँ।”

सूरह अल्-अन्आमः 50

और यह भी कह दें:

“मैं स्वयं अपने नफ़्स के लिए किसी लाभ का अधिकार नहीं रखता और न किसी हानि का, किन्तु उतना ही, जितना कि अल्लाह तआला ने चाहा हो।”

सूरह अल्-आराफ़ः 188

और यह भी कह दें:

“निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए किसी लाभ-हानि का अधिकार नहीं रखता, यह भी कह दीजिए कि मुझे कदापि कोई अल्लाह से नहीं बचा सकता तथा मैं कदापि उसके अतिरिक्त किसी और से शरण का स्थान नहीं पा सकता।”

सूरह अल्-जिन्नः 21-22

और हमारा ईमान है कि

रसूल अल्लाह के बन्दे थे। अल्लाह ने उन्हें रिसालत (दूतत्व) से सम्मानित किया। अल्लाह तआला ने उन्हें गौरव और प्रतिष्ठा के स्थानों तथा प्रशंसा के प्रसंग (सियाक़) में दासत्व के विशेषण से विशेषित किया है। चुनांचे प्रथम दूत नूह़ अलैहिस्सलाम के सम्बंध में फ़रमायाः

“ऐ उन लोगों की संतान, जिनको हमने नूह़ अलैहिस्सलाम के साथ (नाव में) सवार किया था! निःसंदेह वह अत्यधिक कृतज्ञ भक्त था।”

सूरह अल्-इस्राः 3

और सबसे अन्तिम रसूल मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बारे में फरमायाः

“अत्यंत शुभ है वह (अल्लाह तआला) जिसने अपने भक्त पर फ़ुर्क़ान (क़ुर्आन) अवतरित किया, ताकि वह जगत के लिए सतर्क करने वाला बन जाए।”

सूरह अल्-फ़ुर्क़ान- 1

तथा अन्य रसूलों के सम्बंध में फ़रमायाः

“तथा हमारे भक्तों इब्राहीम, इस्ह़ाक़ एवं याक़ूब को भी याद करो, जो हाथों एवं आँखों वाले थे।”

सूरह सादः 45

“तथा हमने दाऊद को सुलैमान नामी पुत्र प्रदान किया, जो अति उत्तम भक्त था तथा अत्यधिक ध्यान लगाने वाला था।”

सूरह सादः 17

और मर्यम के पुत्र ईसा के सम्बंध में फरमायाः

“वह तो हमारे ऐसे भक्त थे, जिनपर हमने उपकार किया तथा उसे बनी इस्राईल के लिए निशानी बनाया।”

सूरह अज़्-ज़ुख़रुफ़ः 59

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला ने मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दूतत्व का सिलसिला समाप्त कर दिया तथा आपको सम्पूर्ण मानवता के लिए रसूल बनाकर भेजा।

अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

“आप कह दीजिए कि ऐ लोगो! मैं तुम सब की ओर अल्लाह का भेजा हुआ हूँ (अर्थात उसका रसूल हूँ), जिसके लिए आकाशों एवं धरती का राजत्व है, उसके अतिरिक्त कोई भी उपासना के योग्य नहीं, वही जीवन प्रदान करता है तथा वही मृत्यु देता है, इसलिए अल्लाह पर तथा उसके उम्मी (निरक्षर, अनपढ़) दूत पर, जो अल्लाह और उसके सभी कलाम पर ईमान रखते हैं, उनका अनुसरण करो, ताकि तुम सत्य मार्ग पा जाओ।”

सूरह अल्-आराफ़ः 158

और हमारा ईमान है कि मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शरीअत ही दीने इस्लाम (इस्लाम धर्म) है, जिसे अल्लाह तआला ने अपने बन्दों के लिए पसंद किया है। अतः किसी से इस दीन के अतिरिक्त कोई दीन क़बूल नहीं करेगा। अल्लाह तआला ने फ़रमाया

“निःसंदेह, अल्लाह के पास इस्लाम ही धर्म है।”

सूरह आले-इम्रानः 19

“आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को पूरा कर दिया तथा तुमपर अपनी अनुकम्पा पूरी कर दी एवं तुम्हारे लिए इस्लाम धर्म को पसंद कर लिया।”

सूरह अल्-माइदाः 3

“तथा जो व्यक्ति इस्लाम के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म की खोज करे, उसका धर्म कदापि मान्य नहीं होगा तथा वह परलोक में क्षतिग्रस्तों में होगा।”

सूरह आले-इम्रानः 85

हमारा अक़ीदा है कि जो इस्लाम धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म जैसे यहूदियत अथवा नसरानियत आदि को स्वीकार योग्य समझे, वह काफ़िर है। उसे तौबा करने के लिए कहा जायेगा। यदि वह तौबा कर ले, तो ठीक है, नहीं तो धर्मत्यागी होने के कारण क़त्ल किया जाएगा। क्योंकि वह क़ुर्आन को झुठलाने वाला है

हमारा यह भी अक़ीदा है कि जिस व्यक्ति ने मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की रिसालत या आपके सम्पूर्ण मानवता की ओर  दूत बनकर आने का इन्कार किया, उसने सभी रसूलों के साथ कुफ़्र किया, यहाँ तक कि उस रसूल का भी, जिसके अनुकरण तथा जिसपर ईमान का उसे दावा है। क्योंकि अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

“नूह़ (अलैहिस्सलाम) की क़ौम ने रसूलों को झुठलाया।”

सूरह अश्-शुअराः 105

इस पवित्र आयत ने उन्हें सारे रसूलों को झुठलाने वाला ठहराया, ह़ालाँकि नूह़ अलैहिस्सलाम से पूर्व कोई रसूल नहीं गुज़रा। अल्लाह तआला ने दूसरी जगह फ़रमाया

“जो लोग अल्लाह तआला तथा उसके रसूलों के प्रति अविश्वास रखते हैं और चाहते हैं कि अल्लाह तथा उसके रसूलों के मध्य अलगाव करें और कहते हैं कि हम कुछ को मानते हैं और कुछ को नहीं मानते एवं इसके बीच रास्ता बनाना चाहते हैं, विश्वास करो कि यह सभी लोग अस्ली काफ़िर हैं। और काफ़िरों के लिए हमने अत्यधिक कठोर यातनायें तैयार कर रखी हैं।”

सूरह अन्-निसाः 150-151

और हम ईमान रखतें हैं कि मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बाद कोई नबी नहीं। अतः आपके बाद जिस किसी ने नबूअत का दावा किया या नबूअत के दावेदार की पुष्टि की, वह काफ़िर है। क्योंकि वह अल्लाह तआला और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को एवं मुसलमानों के इजमा (एकमत) को झुठलाने वाला है।

और हम ईमान रखते हैं कि आपके कुछ सत्य मार्ग पर चलने वाले ख़लीफ़े (ख़ुलफ़ाये राशेदीन) हैं। उन्होंने उम्मत को आपके बाद ज्ञान, दअवत तथा शासन-प्रशासन के मामले में प्रतिनिधित्व प्रदान की। और हम इस पर भी ईमान रखते हैं कि ख़ुलफ़ा में सबसे अफ़्ज़ल और ख़िलाफ़त के सबसे ह़क़दार अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु हैं, फिर उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु, फिर उस्मान बिन अफ़्फ़ान रज़ियल्लाहु अन्हु, फिर अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु।

मर्यादा में जिस तरह उनकी तर्तीब रही, उसी क्रमानुसार वह ख़िलाफ़त के अधिकारी भी हुए। अल्लाह तआला का कोई काम ह़िक्मत से ख़ाली नहीं होता। इसलिए उसकी शान से यह बात बहुत परे है कि वह ख़ैरुल क़ुरून (सबसे उत्तम ज़माना) में किसी उत्तम तथा ख़िलाफ़त के अधिक अधिकार रखने वाले व्यक्ति की उपस्थिति में किसी अन्य व्यक्ति को मुसलमानों पर आच्छादित करता।

और हमारा ईमान है कि उपरोक्त ख़ुलफ़ा में मफ़्ज़ूल (अपेक्षाकृत मर्यादा में कम) ख़लीफ़ा में ऐसी विशिष्टता पाई जा सकती है, जिसमें वह अपने से अफ़्ज़ल से श्रेष्ठ हो, लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वह अपने से अफ़्ज़ल ख़लीफ़ा से हर विषय में प्रधानता रखते हैं, क्योंकि प्रधानता के कारण अनेक तथा विभिन्न प्रकार के होते हैं।

और हमारा ईमान है कि यह उम्मत अन्य उम्मतों से उत्तम है तथा अल्लाह के यहाँ इसकी इज़्ज़त एवं प्रतिष्ठा अधिक है।

अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

“तुम सर्वश्रेष्ठ उम्मत हो, जो लोगों के लिए पैदा की गयी है कि तुम सत्कर्मों का आदेश देते हो और कुकर्मों से रोकते हो और अल्लाह तआला पर ईमान रखते हो।”

सूरह आले-इम्रानः 110

और हम ईमान रखते हैं कि उम्मत में सबसे उत्तम सह़ाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम थे, फिर ताबेईन और फिर तबा-ताबेईन रह़ेमहुमुल्लाह।

और हमारा ईमान है कि इस उम्मत में से एक जमाअत विजयी बनकर सदैव सत्य पर क़ाय रहेगी। उनका विरोध करने वाला या उन्हें रुस्वा करने वाला कोई व्यक्ति उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा, यहाँ तक कि अल्लाह का हुक्म आ जाय।

सह़ाबा किराम रजियल्लाहु अन्हुम के बीच जो मतभेद हुए, उनके सम्बन्ध में हमारा विश्वास यह है कि वह इजतिहादी मतभेद थे। अतः उनमें से जो सही दिशा को पहुँच पाये, उनके लिए दोहरा अज्र है और जो सही दिशा को नहीं पहुँच पाये, उनके लिए एक अज्र है तथा उनकी भूल क्षमायोग्य है।

हमें इस पर भी विश्वास है कि उनकी अप्रिय बातों की आलोचना करने से पूर्णतः बचना अनिवार्य है। केवल उनकी उत्तम बातों की प्रशंसा करनी चाहिए जिसके वह ह़क़दार हैं। तथा उनमें से हरेक के सम्बन्ध में हमें अपने दिलों को वैर एवं कपट से पवित्र रखना चाहिए

क्योंकि उनकी शान में अल्लाह तआला का कथन हैः

“तुममें से जिन लोगों ने विजय से पूर्व अल्लाह के मार्ग में खर्च किया तथा धर्मयुध्द किया, वह (दूसरों के) समतुल्य नहीं, अपितु उनसे अत्यंत उच्च पद के हैं, जिन्होंने विजय के पश्चात दान किया तथा धर्मयुध्द किया। हाँ, भलाई का वचन तो अल्लाह तआला का उनसब से है।”

सूरह अल्-ह़दीदः 10

तथा हमारे सम्बन्ध में अल्लाह तआला का कथन हैः

“तथा (उनके लिए) जो उनके पश्चात आयें, जो कहेंगे कि हे हमारे प्रभु! हमें क्षमा कर दे तथा हमारे उन भाईयों को भी, जो हमसे पूर्व ईमान ला चुके हैं तथा ईमान वालों के बारे में हमारे हृदय में कपट (एवं शत्रुता) न डाल। हे हमारे प्रभु! निःसंदेह तू प्रेम एवं दया करने वाला है।”

सूरह अल्-ह़श्रः 10

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