भाग्य पर ईमान | जानने अल्लाह

भाग्य पर ईमान

मुह़म्मद बिन सालेह अल-उसैमीन

हम भाग्य पर ईमान रखते हैं।

अच्छे तथा बुरे दोनों पर। दर असल भाग्य विश्व के सम्बन्ध में ज्ञान तथा हिक्मत के अनुसार अल्लाह तआला का निर्धारण है।

भाग्य की चार श्रेणियाँ हैं:

इल्म (ज्ञान)

हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला हर चीज़ के सम्बन्ध में; जो हो चुका है, जो होने वाला है और जिस प्रकार होगा, सब कुछ अपने अनादिकाल एवं सर्वकालिक ज्ञान के द्वारा जानता है। उसका ज्ञान नया नहीं है, जो अज्ञानता के बाद प्राप्त होता है और न ही वह ज्ञान के बाद विस्मरण का शिकार होता है। अर्थात न उसके ज्ञान का कोई आरम्भ है और न अन्त।

लिपिबध्द करना

हमारा ईमान है कि क़ियामत तक जो कुछ होने वाला है अल्लाह तआला ने उसे लौह़े मह़्फ़ूज़ में लिपिबध्द कर रखा है।

“क्या आपने नहीं जाना कि आकाश तथा धरती की प्रत्येक पस्तु अल्लाह के ज्ञान में है। यह सब लिखी हुई किताब में सुरक्षित है। अल्लाह के लिए यह कार्य अत्यन्त सरल है।”

सूरह ह़ज्जः 70

मशीअत (ईश्वरेच्छा)

हमारा ईमान है कि जो कुछ आकाशों एवं धरती में है, सब अल्लाह की इच्छा से वजूद में आया है। कोई वस्तु उसकी इच्छा के बिना नहीं होती। अल्लाह तआला जो चाहता है, होता है और जो नहीं चाहता, नहीं होता।

ख़ल्क़ (रचना)

हमारा ईमान है क

“अल्लाह समस्त वस्तुओं का रचयिता है तथा वही प्रत्येक वस्तु का संरक्षक है। आकाशों तथा धरती की चाबियों का वही स्वामी है।”

सूरह अज़्-ज़ुमरः 62-63

भाग्य की इन चारों श्रेणियों में वह सब कुछ आ जाता है, जो स्वयं अल्लाह की ओर से अथवा बन्दों की ओर से होता है। अतः बन्दे जो कुछ अन्जाम देते हैं, चाहे वह कथनात्मक हो, कर्मात्मक हो या वर्जात्मक, सब अल्लाह के ज्ञान में है एवं उसके पास लिपिबध्द है। अल्लाह तआला ने उन्हें चाहा तथा उनकी रचना की

“(विशेष रूप से) उसके लिए जो तुममें से सीधे मार्ग पर चलना चाहे। तथा तुम बिना समस्त जगत के प्रभु के चाहे, कुछ नहीं चाह सकते।”

सूरह अत्-तक्वीरः 28-29

“और यदि अल्लाह तआला चाहता, तो यह लोग आपस में न लड़ते, किन्तु अल्लाह जो चाहता है, करता है।”

सूरह अल्-बक़राः 253

“और अगर अल्लाह चाहता, तो वे ऐसा नहीं करते, इसलिए आप उनको तथा उनकी मनगढ़ंत बातों को छोड़ दीजिए।”

सूरह अन्-आमः 137

“ह़ालाँकि तुमको और जो तुम करते हो उसको, अल्लाह ही ने पैदा किया है।”

सूरह साफ़्फ़ातः 96

लेकिन इसके साथ-साथ हमारा यह भी ईमान है कि अल्लाह तआला ने बन्दों को अख़्तियार तथा शक्ति दी है, जिसके आधार पर ही कर्म संघटित होते हैं:

1-अल्लाह तआला का फ़र्मान हैः

“अपनी खेतियों में जिस प्रकार चाहो, जाओ।”

सूरह अल्-बक़राः 223

और उसका फ़र्मान है

“अगर वह निकलना चाहते, तो उसके लिए संसाधन तैयार करते।”

सूरह अत्-तौबाः 46

2- बन्दे को आदेश-निषेध का निर्देश। अगर बन्दे को अख़्तियार तथा शक्ति न होती, तो आदेश-निषेध का निर्देश उन भारों में से शुमार किया जाता, जो ताक़त से बाहर हैं। जबकि अल्लाह तआला की ह़िक्मत, रह़मत तथा उसकी सत्य वाणी इसका खण्डन करती है। अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

“अल्लाह किसी व्यक्ति को उसकी शक्ति से अधिक भार नहीं देता।”

सूरह अल्-बक़राः 286

3- सदाचार करने वाले की, उसके सदाचार पर प्रशंसा एवं दुराचार करने वाले की, उसके दुराचार पर निंदा तथा उन दोनों में से प्रत्येक को उनके कर्मानुसार बदला देना। यदि बन्दे का कर्म उसके अख़्तियार तथा इच्छा से न होता, तो सदाचारी की प्रशंसा करना निरर्थ होता एवं दुराचारी को सज़ा देना अत्याचार होता। जबकि अल्लाह तआला निरर्थ कामों एवं अत्याचार से पवित्र है

4- अल्लाह तआला का रसूलों को भेजना

“(हमने इन्हें) शुभसूचक एवं सचेतकर्ता रसूल बनाया, ताकि लोगों को कोई बहाना तथा अभियोग रसूलों को भेजने के पश्चात अल्लाह पर न रह जाये।”

सूरह अन्-निसाः 16

5- हर काम करने वाला व्यक्ति, काम करते या छोड़ते समय अपने आपको हर प्रकार की कठिनाइयों से मुक्त पाता है। वह केवल अपने इरादे से उठता-बैठता, आता-जाता तथा यात्रा एवं निवास करता है। उसे यह अनुभव नहीं होता कि कोई उसे इसपर विवश कर रहा है। बल्कि वह उन कामों में, जो अपने अख़्तियार से करता है और उन कामों में, जो किसी के विवश करने से करता है, वास्तविक अन्तर कर लेता है। इसी तरह शरीअत ने भी इन दोनों अवस्थाओं के दरमियान हिक्मत से भरा हुआ अन्तर किया है। अतः मनुष्य यदि अल्लाह के अधिकार सम्बन्धी कार्यों को विवश होकर कर जाये, तो उसकी कोई पकड़ नहीं होगी

अगर बन्दे का कर्म उसके अख़्तियार एवं इच्छा से न होता, तो रसूल को भेजने से उसका बहाना तथा अभियोग बातिल न होता।

हमारा अक़ीदा है कि पापी को अपने पाप को सही ठहराने के लिए, भाग्य को ह़ुज्जत बनाने का कोई अधिकार नहीं है। क्योंकि वह अपने अख़्तियार से पाप करता है और उसे इसका बिल्कुल ज्ञान नहीं होता कि अल्लाह तआला ने उसके भाग्य में यही लिख रखा है। क्योंकि किसी कार्य के होने से पूर्व कोई नहीं जान सकता कि अल्लाह तआला उसे उसके भाग्य में लिख रखा है।

“कोई भी नहीं जानता कि वह कल क्या कमायेगा?”

सूरह लुक़मानः 34

जब मनुष्य कोई क़दम उठाते समय इस ह़ुज्जत को जानता ही नहीं, तो फिर सफ़ाई देते समय उसका इसे पेश करना कैसे सही हो सकता है? अल्लाह तआला ने इस ह़ुज्जत को बातिल ठहराते हुए फ़रमाया

“जो लोग शिर्क करते हैं, वह कहेंगे कि यदि अल्लाह चाहता, तो हम तथा हमारे पूर्वज शिर्क नहीं करते और न हम किसी चीज़ को ह़राम ठहराते। इसी प्रकार उन लोगों ने झुठलाया, जो उनसे पहले थे, यहाँ तक कि हमारे प्रकोप (अज़ाब) का मज़ा चखकर रहे। कह दो, क्या तुम्हारे पास कोई ज्ञान है तो उसे हमारे लिए निकालो (व्यक्त करो)। तुम कल्पना का अनुसरण करते हो तथा मात्र अनुमान लगाते हो।”

सूरह अल्-अन्आमः 148

तथा हम भाग्य को आधार बनाकर पेश करने वाले पापियों से कहेंगेः आप पुण्य का काम यह समझकर क्यों नहीं करते कि अल्लाह तआला ने आपके भाग्य में यही लिखा है? अज्ञानता में कार्य के होने से पहले पाप एवं आज्ञापालन में इस आधार पर कोई अन्तर नहीं है। यही कारण है कि जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सह़ाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम को यह सूचना दी कि तुममें से हरेक का ठिकाना स्वर्ग या नरक में तय कर दिया गया है,  और उन्होंने निवेदन किया कि क्या हम कर्म करने को छोड़कर उसी पर भरोसा न कर लें? तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः नहीं, तुम अमल करते रहो, क्योंकि जिसको जिस ठिकाने के लिए पैदा किया गया है, उसे उसी के कर्मों का सामर्थ्य दिया जाता है!

तथा अपने पापों पर भाग्य से ह़ुज्जत पकड़ने वालों से कहेंगेः यदि आपका इरादा मक्का की यात्रा का हो, तथा उसके दो मार्ग हों, और आपको कोई विश्वासी व्यक्ति यह बताये कि उनमें से एक मार्ग बहुत ही भयंकर एवं कष्टदायक तथा दूसरा बहुत ही सरल एवं शान्तिपूर्ण है, तो आप निश्चय ही दूसरा मार्ग अपनायेंगे। यह असंभव है कि आप पहले वाले भयंकर मार्ग पर यह कहते हुए चल निकलें कि मेरे भाग्य में यही लिखा है। अगर आप ऐसा करते हैं, तो दीवानों में शमार होंगे।

और हम उनसे यह भी कहेंगे कि यदि आपको दो नौकरियों का प्रस्ताव दिया जाय और उनमें से एक का वेतन अधिक हो, तो आप निश्चित रूप से कम वेतन वाली नौकरी की बजाय अधिक वेतन वाली नौकरी को चुनेंगे। तो फिर परलौकिक कर्मों के मामले में आप क्यों कमतर को चुनकर भाग्य की दुहाई देते हैं?

और हम उनसे यह भी कहेंगे कि जब आप किसी शारीरिक रोग में ग्रस्त होते हैं, तो अपने उपचार के लिए हर डॉक्टर का दरवाज़ा खटखटाते हैं और आरेशन की पीड़ा एवं कड़वी दवा पूरे धैर्य के साथ सहन करते हैं, तो फिर अपने दिल पर पापों के रोग के ह़मले की सूरत में ऐसा क्यों नहीं करते?

हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला की अशेष कृपा एवं ह़िक्मत के चलते बुराई का सम्बन्ध उससे जोड़ा नहीं जायेगा। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

तथा बुराई तेरी ओर मन्सूब नहीं है।

मुस्लिम

अल्लाह तआला के आदेशों में स्वयं कभी बुराई नहीं होती। क्योंकि वह उसकी कृपा एवं हिक्मत से जारी होते हैं। बल्क़ि बुराई उसकी निर्णीत वस्तुओं में होती है। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ह़सन रज़ियल्लाहु अन्हु को दुआये क़ुनूत की शिक्षा देते हुए फ़रमायाः

मुझे अपनी निर्णीत चीज़ों के अनिष्ट से सुरक्षित रख।

इसमें अनिष्ट का सम्बन्ध अल्लाह की निर्णीत वस्तुओं से जोड़ा गया है। इसके बावजूद निर्णीत वस्तुओं में सिर्फ़ बुराई ही नहीं होती, बल्कि उनमें एक कोण से बुराई होती है तो दूसरे कोण से भलाई अथवा एक स्थान पर बुराई होती है तो दूसरे स्थान पर अच्छाई।

चुनांचे ज़मीन में विकार जैसे अकाल, बीमारी, फ़क़ीरी तथा भय आदि बुराई हैं। किन्तु इनमें भलाई का पक्ष भी मौजूद है। अल्लाह तआला ने फ़रमयाः

“जल और थल में लोगों के कुकर्मों के कारण फ़साद फैल गया, ताकि उन्हें उनके कुछ कर्तूतों का फल अल्लाह तआला चखा दे, (बहुत) मुम्किन है कि वह रुक जायें।”

सूरह अर्-रूमः 41

तथा चोर का हाथ काटना एवं बियाहता व्याभिचारी को रज्म (संगसार) करना, चोर और व्यभिचारी के लिए तो अनिष्ट है, क्योंकि एक का हाथ नष्ट होता है तो दूसरे की जान जाती है, परन्तु दूसरे कोण से यह उनके लिए उपकार है, क्योंकि इससे पापों का निवारण होता है। अल्लाह तआला उनके लिए लोक-परलोक की सज़ा इकट्ठा नहीं करेगा। तथा दूसरे स्थान पर यह इस कोण से भी उपकार है कि इससे लोगों की सम्पत्तियों, प्रतिष्ठाओं एवं गोत्रों की रक्षा होती है

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