द्वितीय स्तम्भ: नमाज़ | जानने अल्लाह

द्वितीय स्तम्भ: नमाज़

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द्वितीय स्तम्भ: नमाज़

            इस नमाज़ को अल्लाह तआला ने इसलिए मशरुअ किया है ताकि वह अल्लाह तआला और बन्दे के मध्य संबंध का माध्यम बन जाए जिसमें वह उसकी आराधना करे और उसे पुकारे,  नमाज धर्म का खम्बा और उसका मूल स्तम्भ है,  जिस प्रकार कि तम्बू का खम्बा होता है यदि वह गिर जाए तो अवशेष स्तम्भों का कोर्इ मूल्य नहीं रह जाता,  इसी के बारे में कि़यामत के दिन मनुष्य से सर्वप्रथम पूछ-ताछ किया जाएगा (हिसाब लिया जाएगा),  यदि यह (नमाज़) स्वीकार कर ली गर्इ तो उसके सारे कर्म स्वीकार कर लिए जाएंगे,  और यदि इसे ठुकरा दिया गया तो उसके सारे कर्म ठुकरा दिए जाएंगे।

            अल्लाह तआला ने इस नमाज़ के लिए कुछ शर्तें निर्धारित की हैं,  तथा इसके कुछ अरकान और वाजिबात भी हैं,  जिन्हें उनके लक्षित विधि पर करना प्रत्येक नमाज़ी के लिए आवश्यक है ताकि अल्लाह के पास वह नमाज़ स्वीकार हो।

नमाज़ और उसकी रकअतों की संख्या:

इन नमाज़ों की संख्या दिन और रात में पांच बार है, और वह नमाज़ें यह हैं, फज्र की नमाज़ दो रकअत,  ज़ुह्र की नमाज़ चार रकअत,  अस्र की नमाज़ चार रकअत,  मग़रिब की नमाज़ तीन रकअत,  और इशा की नमाज़ चार रकअत। तथा इनमें से प्रत्येक नमाज़ का एक निर्धारित समय है जिससे उसको विलम्ब करना जायज़ नहीं है, जिस प्रकार कि उसे उसके समय से पहले पढ़ना जायज़ नहीं, और यह नमाज़ें मसिजदों में पढ़ी जाएंगी जो अल्लाह के घर हैं, इससे केवल उस व्यक्ति को छूट है जिसके पास कोर्इ षरर्इ कारण हो जैसेकि यात्रा और बीमारी आदि।

नमाज़ के फायदे और विशेषताएं :

इन नमाजों को पाबंदी के साथ पढ़ने के बहुत से लौकिक और प्रलौकि लाभ और विशेषताएं हैं, जिनमें से कुछ यह हैं :

(1)   यह नमाज़ मनुष्य के लिए संसार की बुरार्इयों और कठिनार्इयों से सुरक्षित रहने का कारण है, इसके बारे में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं :

من صلى الصبح في جماعة فهو في ذمة الله ، فانظر يا ابن آدم لا يطلبنك الله من  رواه مسلم           ذمته بشيء                                 

जिसने सुबह (फज्र) की नमाज़ जमाअत के साथ पढ़ी वह अल्लाह तआला की सुरक्षा में है, सो ऐ आदम के बेटे, देख कहीं अल्लाह तआला तुझसे अपनी सुरक्षा में से किसी चीज़ का मुतालबा न करने लगे। (मुस्लिम).

( 2 )-  नमाज़ गुनाहों के क्षमा का कारण है जिनसे कोर्इ व्यक्ति सुरक्षित नहीं रह पाता है, इसके बारे में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं:

;;من تطهر في بيته، ثم مضى إلى بيت من بيوت الله ليقضي فريضة من فرائض الله ، كانت خطواته إحداها تحط خطيئة ، والأخرى ترفع درجة رواه مسلم   

जो  व्यक्ति अपने घर में वुज़ू करता है, फिर अल्लाह के घरों में से किसी घर (मस्जिद) में अल्लाह तआला की अनिवार्य की हुर्इ किसी फर्ज़ नमाज़ को पढ़ने के लिए जाता है, तो उसके एक पग पर एक गुनाह झड़ता है और दूसरे पग पर एक पद बलन्द होता है। (मुस्लिम)

 (3)  यह नमाज़ पढ़ने वालों के लिए फरिश्तों की दुआ (आशीर्वाद) और उनकी क्षमा याचना करने का कारण है , इसके विषय में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं:

;;الملائكة تصلي علي أحدكم مادام في مصلاه الذي صلى فيه ما لم يحدث، تقول

اللهم اغفر له، اللهم ارحمه رواه البخاري    

फरिश्ते तुम्हारे लिए रहमत की दुआ करते रहते हैं जब तक तुम में से कोर्इ व्यक्ति अपने उस स्थान पर होता है जिसमें उसने नमाज़ पढ़ी है, जब तक कि उसका वुज़ू टूट न जाए, फरिश्ते दुआ करते हैं: ऐ अल्लाह! उसे क्षमा कर दे, ऐ अल्लाह! उस पर दया कर। (बुखारी)

(4) नमाज़ शैतान पर विजय प्राप्त करने,  उसे परास्त करने और उसे अपमानित करने का साधन है।

( 5 ) नमाज़ मनुष्य के लिए कि़यामत के दिन सम्पूर्ण प्रकाश (नूर) प्राप्त करने का कारण है, इसके विषय में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं:

  بشروا المشائين في الظلم إلى المساجد، بالنور التام يوم القيامة

رواه الترمذي و أبو داود

अंधेरों में मसिजदों की ओर जाने वालों को, कि़यामत के दिन सम्पूर्ण प्रकाश (नूर) की शुभ सूचना दे दो। (अबु-दाऊद, त्रिमिज़ी)

(6)- जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ने का कर्इ गुना अज्र व सवाब (पुण्य) है, इसके विषय में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं:

صلاة الجماعة أفضل من صلاة الفذ بسبع وعشرين درجة  

متفق عليه

जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ना अकेले नमाज़ पढ़ने से सत्तार्इस गुना अधिक श्रेष्ठ है। (बुखारी व मुस्लिम)

(7)- नमाज़ में उन मुनाफिक़ों (पाखणिडयों) के अवगुणों में से एक अवगुण से छुटकारा है जिनका ठिकाना जहन्नम का सबसे निचला भाग है, नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं :

 ليس صلاة أثقل على المنافقين من صلاة الفجر والعشاء ، ولو يعلمون ما فيهما لأتوهما ولو حبوا متفق عليه

मुनाफिक़ों पर फज्र और इशा की नमाज़ से अधिक भारी कोर्इ नमाज़ नहीं, यदि उन्हें पता चल जाए कि उन दोनों में क्या - अज्र व सवाब- है तो वह उसमें अवश्य आएं चाहे घुटनों के बल घिसट कर ही क्यों न आना पड़े। (बुखारी व मुस्लिम).

(8) यह मनुष्य के लिए वास्तविक सौभाग्य, हार्दिक सन्तुष्टि की प्राप्ति और मानसिक रोगों तथा जीवन की समस्याओं से छुटकारा पाने का उचित मार्ग है, जिन से आजकल अधिकांश लोग जूझ रहे हैं, जैसे कि शोक, चिन्ता, बेचैनी, व्याकुलता, और बहुत से परिवारिक, व्यापारिक और वैज्ञानिक मामलों में नाकामी इत्यादि।

(9) नमाज़ स्वर्ग में प्रवेष पाने का कारण है, इसके विषय में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं:

متفق عليه  من صلى البردين دخل الجنة 

जिसने दो ठंढी नमाज़ें (अस्र और फज्र की नमाजे़ं) पढ़ीं वह जन्नत में प्रवेष करेगा। (बुखरी व मुस्लिम)

 لن يلج النار أحد صلى قبل طلوع الشمس وقبل غروبها

يعني الفجر و العصر رواه مسلم  

जिस व्यक्ति ने भी सूरज निकलने और उसके डूबने से पहले नमाज़ पढ़ी वह जहन्नम में कदापि नहीं जाएगा, अर्थात फज्र और अस्र की नमाज़।  (मुस्लिम)

इसके अतिरिक्त इस्लाम के अन्दर अन्य नमाज़ें भी हैं जो अनिवार्य नहीं हैं, बलिक वह सुन्नत (ऐचिछक) हैं, जैसे कि सलातुल र्इदैन (र्इदुल-फि़त्र और र्इदुल-अज़्हा की नमाज़) चांद और सूरज ग्रहण की नमाज़, सलातुल-इसितस्क़ा, (वर्षा मांगने की नमाज़) और सलातुल-इसितखारा इत्यादि।

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