वादा-ख़िलाफ़ी सख़्ती से मना | जानने अल्लाह

वादा-ख़िलाफ़ी सख़्ती से मना

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इस्लाम में प्रतिज्ञाभंग (बदअहदी) को भी सख़्ती से मना कर दिया गया है। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) फ़ौजों को भेजते वक़्त जो हिदायतें देते थे, उनमें से एक यह थी ‘‘बदअहदी न करना।’’ क़ुरआन और हदीस में इस हुक्म को बार-बार दोहराया गया है कि दुश्मन अगर वचन व प्रतिज्ञा की ख़िलाफ़वर्ज़ी करता है तो करे, लेकिन तुम को अपने प्रतिज्ञा व वचन की ख़िलाफ़वर्ज़ी कभी न करना चाहिए। हुदैबिया की सुलह की मशहूर घटना है कि सुलहनामा तय हो जाने के बाद एक मुसलमान नौजवान अबू-जंदल (रज़ियल्लाहु अन्हु) जिनका बाप सुलहनामे की शर्तें अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से तय कर रहा था, बेड़ियों में भागते हुए आये और उन्होंने कहा मुसलमानो मुझे बचाओ!! अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उनसे फ़रमाया कि मुआहदा हो चुका है। अब हम तुम्हारी मदद नहीं कर सकते, तुम वापस जाओ। अल्लाह तुम्हारे लिए कोई रास्ता खोलेगा। उनकी दयनीय दशा को देखकर मुसलमानों की पूरी फ़ौज रो पड़ी, लेकिन अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने जब फ़रमा दिया कि वचन (अहद) को हम तोड़ नहीं सकते, तो उनको बचाने के लिए एक भी व्यक्ति आगे न बढ़ा और काफ़िर उनको जबरन घसीटते हुए ले गए। यह वचन व प्रतिज्ञा की पाबन्दी की अनोखी मिसाल है और इस्लामी इतिहास में ऐसी मिसालें बहुत-सी मौजूद हैं।

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