वे हरगिज़ लाभ नहीं उठा सकेंगे | जानने अल्लाह

वे हरगिज़ लाभ नहीं उठा सकेंगे

Site Team

एक बार मेरे मोबाइल फोन  पर  एक सन्देश प्राप्त हुआ, सन्देश कुछ इस तरह था:"प्रिय शेख़! आत्महत्या पर इस्लाम धर्म का निर्णय क्या है ?
मैंने सन्देश भेजने वाले को  कॉल किया तो लगा कि बात करने वाला एक नौजवान आदमी है l मैंने कहा:माफ  कीजिएगा, मैं ने आपका  प्रश्न नहीं  समझा, कृपया आप फिर से अपना प्रश्न दुहराएं?
वह ज़रा परेशान हो गया और कहा: प्रश्न तो साफ़ है, आत्महत्या के विषय में इस्लाम धर्म का फैसला क्या है?
मैंने सोंचा  की उसे ज़रा आश्चर्य  प्रतिक्रिया में उत्तर दूँ , इस पर मैंने कहा:यह तो एक पसंदीदा और सराहनीय काम है l
वह चिल्लाया और कहा:क्या? आपने क्या कहा:
मैंने कहा: यह काम तो बहुत अच्छा है l

लेकिन आपका क्या विचार है यदि हम इस विषय पर बातचीत करें कि आत्महत्या का सबसे अच्छा तरीक़ा क्या है?  

युवा चुप रहा:मेंने पूछा:ठीक है लेकिन यह तो बताओ कि तुम आत्महत्या करना क्यों  चाहते  हो ?

 Unhōnnē kahā, kyōṅki maiṁ

 उसने कहा:क्योंकि मैं एक बेरोज़गार आदमी हूँ, मुझे कोई काम नहीं मिल सका! और लोग मुझे प्यार नहीं करते हैं l वास्तव में मैं एक निरा विफल हूँ l

और इस प्रकार वह अपनी नाकामी से संबंधित लंबी लंबी कहानियाँ सुनाना शुरू किया, यह  साबित करने का प्रयास करने लगा कि वह अपने आपको विकसित करने में क्यों विफल रहा l और अपने भीतर छिपी शक्तियों के उपयोग में क्यों नाकाम रहा? यह एक  की ही समस्या नहीं है बल्कि कई लोगों  की यही समस्या है l हम में से कुछ लोग अपने आप को हीन क्यों महसूस करते हैं? हम उन लोगों को ही क्यों देखते हैं जो पहाड़ की चोटी पर खड़े हैं और फिर उनकी तुलना में अपने आप को  छोटा और चोटी पर चढ़ने से बेबस समझ बैठते हैं lजबकि होना तो यह चाहिए कि जिसतरह वे चोटी पर चढ़े हैं आप भी चढ़ सकते हैं l एक कविता जिसका अनुवाद है:

जो पहाड़ों की  चढ़ाई से  डर जाता है l
वह सदा  खाईयों में ही रह जाता है l
क्या आप जानते हैं कि इस पुस्तक से,या इस प्रकार की अन्य किसी पुस्तक से वह कौन सा व्यक्ति है जिसको बिल्कुल कोई लाभ प्राप्त नहीं हो सके गा? वह वही बेबस और बेचारा व्यक्ति है जो  अपनी त्रुटियों के सामने हथयार डाल दिया और अपनी हार मान लिया और अपनी शक्तियों को सीमित समझ कर जो है उसी पर संतुष्ट हो गया l और यह कहकर बैठ  गया:यही मेरी शक्ति है इसी पर मेरा जन्म हुआ है, यही मेरी क़िस्मत और भाग है, इस से बढ़ कर कुछ संभव नहीं है, मैं अपने आप में कोई परिवर्तन नहीं ला सकता और लोगों को भी मुझ से इसी की उम्मीद है,   अब यह सोंचना कि मैं ख़ालिद की तरह सुन्दर लेक्चर दूँ, या  अहमद की तरह हंसमुख रहूँ, या ज़ियाद की तरह सब का मनमोहक रहूँ तो यह असंभव है l                                                  एक बार मैं एक सार्वजनिक सभा में उपस्थित था l वहाँ एक बहुत ही बूढ़ा आदमी भी था l अधिकांश सामान्य निपुणता  और क्षमताओं के लोग वहां मौजूद  थे l वह बूढ़ा  आदमी अपने बग़ल में बैठे लोगों के साथ इधर-उधर की बातें कर रहा था l वास्तव में वह आम लोगों की तरह ही एक साधारण आदमी था, लेकिन बुढ़ापे के आधार पर उनको लोगों का सम्मान प्राप्त था l
मैंने  वहाँ एक उपदेश दिया और उसके दौरान एक विख्यात शैख़ अब्द अल अज़ीज़ बिन बाज़ द्वारा दिए गए फतवे का उल्लेख किया l समाप्ति पर  उस बूढ़े आदमी ने मुझसे बड़े गर्व के साथ कहा:शैख़ इब्न बाज़ और मैं  सहयोगि थे! हम एक मस्जिद में एक साथ शैख़ मुहम्मद बिन इब्राहिम के पास लगभग चालीस साल पहले शिक्षा प्राप्त किए थे l

मैं उनकी ओर देखने के लिए अपना सिर घुमाया  और देखा कि वह  यह जानकारी देकर बहुत ख़ुश लग रहे हैं l वह प्रसन्न था की अपनी जीवन में एक बार एक सफल आदमी के साथ उपस्थित था l लेकिन मैंने अपने मन में कहा:बेचारा आदमी!  लेकिन आप इब्न बाज़ की तरह क्यों   सफल नहीं हो पाए? आप तो बिल्कुल सफलता के रास्ते पर थे, फिर आप ने पीछा क्यों नहीं किया? ऐसा  क्यों हुआ कि जब इब्न बाज़ का निधन हुआ तो उनके लिए लोग  मस्जिद में और मंचों पर और मेहराबों में और संस्थानों में आंसू  बहाए  और विभिन्न देशों  को इस क्षति पर दुखी हुए l मनाये:जब आपकी मृत्यु आती है, तो शायद, कोई एक भी आंसू बहाने वाला न हो और यदि कोई बहाए भी तो, सिर्फ दया या परम्परा के अनुसार l

हम भी  कभी कहते हैं  कि: मैं फुलाना फुलाना को जानता हूँ, मैं फुलाना फुलाना के साथ था, फुलाना फुलाना मेरे साथी थे l लेकिन इस पर गर्व  करने से कुछ प्राप्त होने वाला नहीं है l गर्व तो तब होता जब आप भी उस बुलंदी की चोटी पर पहुँचे होते जहाँ वह पहूँचे हुए हैं l

इसलिए ज़रा बहादुर बनिए , और अब से अपनी सभी क्षमताओं का उपयोग करने का पक्का इरादा कीजिए, और सफलता प्राप्त कीजिए, अपने चेहरे की उदासी को मुस्कान में बदलिए, अपने दुख को उत्साह में बदलिए,  अपनी कंजूसी को दानशीलता में बदलिए, और अपने क्रोध को सहनशीलता में बदलिए l

अपने संकटें को ख़ुशी का अवसर बना दीजिए, और  विश्वास का हथियार अपने हाथ से हरगिज़ मत गिरने दीजिए l
अपने जीवन का आनंद लीजिए, इसलिए  की यह जीवन बिल्कुल संक्षिप्त है उदासी के लिए उस में कोई समय ही नहीं है l 

लेकिन यह कैसे होगा? तो ज्ञात होना चाहिए इस पुस्तक की रचना इसी लक्ष्य के लिए हुई है l तो आप मेरे साथ साथ चलिए , और-अल्लाह की कृपा से-अंत में हम निशाना को पाकर रहेंगे l

  
हमारे साथ कौन रहा?

हमारे साथ वही बहादुर बचा, जिसके भीतर अपने आप में परिवर्तन लाने और अपने आपको विकसित करने, और अपनी शक्तियों से लाभ उठाने का पक्का इरादा और सत्य उत्साह उपलब्ध हो l

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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