जीवित और मृत के बीच | जानने अल्लाह

जीवित और मृत के बीच

Site Team

एक आदमी सब केलिए बोझ था अपने सहयोगियों, अपने पड़ोसियों अपने भाइयों,बल्कि अपने बच्चों केलिए भी, जी हाँ वह बेहिस्स था l
उसने सदा लोगों से यही सुना:प्रिय भाई क्या तुम्हारे पास कोई अनुभव नहीं हैं ?
किन्तु वह कभी भी उनको कोई उत्तर नहीं देता था l
एक दिन, उस का बेटा बहुत ख़ुश और उत्साहित दौड़ते हुए उसके पास आया, अपने होमवर्क के नोटबुक को लहराते हुए  उसके सामने खड़ा होगया l उसके शिक्षक ने उसके नोटबुक पर "बहुत बढ़िया" लिख कर हस्ताक्षर किया था l  
पिता ने उसकी ओर उतना ध्यान नहीं दिया, और यूंही कह दिया:ठीक है कोई बड़ी बात नहीं है, मुझे तो ऐसा लगा था कि तुम पीएचडी की डिग्री लेकर आए हो l
पिता की प्रतिक्रिया बेटे की उम्मीद के बिल्कुल ख़िलाफ थी l
इसी तरह उस के पाठ में एक मज़ाकिया छात्र था उसने देखा कि सारे छात्र शिक्षक और पाठ से उब जारहे हैं l
तो उसने वातावरण बदलने केलिए एक चुटकुला छोड़ दिया l फिर भी शिक्षक का तेवर नहीं बदला, और केवल इतना कहा कि तुम अपने आपको चुटकुलाबाज़ बना रहे हो l

जबकि मैं तो यही सोच रहा था कि छात्रों के साथ उनका व्यवहार थोड़ा अलग होगा, किन्तु नहीं l
एक बार वह एक किराने की दुकान पर गया, साधारण दुकानदार ने उसे कहा: अल्लाह का शुक्र है! मेरे परिवार ने मुझे एक पत्र भेजा है! किन्तु उसकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई l कम से कम उसको अपने आप से यह प्रश्न तो पूछना चाहिए था कि उस आदमी ने उसे अपनी बात क्यों बताया l उस ग़रीब दुकानदार ने तो बताया ही था इसलिए कि  वह अपनी ख़ुशी उसके साथ बांटे l
वह अपने एक सहयोगी से मिलने गया, उसने उस केलिए कॉफी और चाय से सेवा किया l फिर घर के अंदर गया और अपने इकलौते नवजात को एक कंबली में अच्छी तरह से लिपट कर उसके सामने लाया, बल्कि यदि  उसकी बस चलती तो उसे अपने पलकों में लपेट लेता lऔर कहा:इस हीरो के बारे में आपका क्या विचार है? तो उसने बेहिस्स की तरह उसकी तरफ देखा और कहा:माशाअल्लाह(अल्लाह ने क्या ही अच्छा चाहा) अल्लाह इसे आप केलिए सुरक्षित रखे l
इस के बाद चाय पीने केलिए पियाली उठाया जबकि इस से अधिक प्रतिक्रिया की उम्मीद थी बच्चे को अपने गोद में लेता, उसे चूमता, उसकी सुंदरता और उसके स्वस्थ्य  को सराहता, किन्तु सही बात यही है कि वह  था ही मूर्ख l
जब आप लोगों के साथ बर्ताव करते हैं तो यह देखें कि कौन सी चीज़ उसकी नज़र में-आपकी की नज़र में नहीं- महत्वपूर्ण है और उसी के अनुसार चलिए l

आपके बेटे केलिए "बहुत बढ़िया" का शब्द एक डोक्टर की पीएचडी की डिग्री से अधिक क़ीमती है l
और वह नवजात शिशु आपके मित्र के पास पूरी दुनिया से भी अधिक क़ीमती है l
जब भी वह अपने बच्चे को देखता है तो यह चाहता है कि अपने दिल को चीर कर उसे उसमे समा ले क्या आपका मित्र आपके प्यार का हक़दार नहीं है? क्या आप उनकी एक ख़ुशी में साथ नहीं दे सकते?

कभी कभी, कुछ लोग किसी विशेष बात पर भावुक होते हैं तो आप भी उस बात पर जोश प्रकट कीजिए, बेहिस्स और पत्थर मत बने रहिए,  बल्कि साथ दीजिए और लोगों का दिल रखिए, आश्चर्य, ख़ुशी या दुख स्पष्ट कीजिए, एक निर्जीव पुतला मत बने रहिए l
यही कारण है कि जो लोग दूसरों की भावनाओं में भाग नहीं लेते हैं उनसे सारे लोग चिढ़ते हैं l ऐसे लोग अक्सर शिकायत करते हैं कि मेरे बच्चे मेरे साथ क्यों बैठना पसंद नहीं करते?
तो हमारा उत्तर यही होता है: कि जब वे आपको कोई चुटकुला सुनाते हैं तो आप उनका साथ नहीं देते हैं l  और जब वे अपने स्कूल से संबंधित अपनी कहानियां कहते हैं तो ऐसा लगता है कि वे किसी दीवार से बात कर रहे हैं l यहां तक ​​कि यदि किसी व्यक्ति ने आपको ऐसी कहानी सुनाई जिसे आप पहले से जानते हैं फिर भी उसका साथ देने में कोई रुकावट नहीं है l

अब्दुल्ला-बिन-मुबारक ने कहा है कि:अल्लाह की क़सम मुझे कभी कभी कोई व्यक्ति ऐसी बात सुनाता है जिसे मैं उसके जन्म से पहले से जानता हूँ किन्तु फिर भी मैं उसे इस तरह सुनता हूँ जैसे अभी अभी पहली बार  सुन रहा हूँ l  
जी हाँ यह क्या ही सुंदर कौशल है!
खंदक़ की लड़ाई से ठीक पहले मुसलमानों ने खाइयां खोद ली lऔर अच्छी तरह से खाइयों को तैयार कर लिए l  उन लोगों के बीच एक आदमी था जिसका  नाम जुऐल था तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- ने उनका नाम बदल कर अम्र रख दिया l तो वह हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-के साथ काम करते जाते थे और यह कविता गुनगुनाते जाते थे:

(उसका नाम पहले जुऐल था और अब अम्र होगया l
और एक ग़रीब आदमी का सहायक बन गया l)
जब वे "अमरण" नाम बोलते थे तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-भी "अमरण" बोलते थे l  और जब वे "ज़हरण" बोलते थे तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- भी "ज़हरण" बोलते थे l

तो वे ज़ियादा जोश में आते थे और उनको यह लग रहा था कि हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-भी उनके साथ हैं l 
जब रात हुई तो तेज़ सर्दी पड़ी किन्तु वे खुदाई में लगे रहे l इतने में हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-उनकी ओर निकले तो उन्होंने देखा कि लोग ख़ुद अपने हाथों से खुदाई का काम कर रहे हैं और बिल्कुल ख़ुश और आनन्दित हैं l  

जब उन लोगों ने हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-को देखा तो यह गुनगुनाने लगे:     
(हम वही हैं जो मुहम्मद के हाथ पर वादा किए l  
कि जब तक हम जियेंगे जिहाद करेंगे l)
तो उन्होंने उनके उत्तर में कहा: हे अल्लाह, निस्संदेह जीवन तो बस आख़िरत की जीवन है l तो तू अनसार और मुहाजिरीन को माफ कर दे l
और वह लगातार दिन भर उनका साथ देते थे इसलिए उन्होंने उनको यह गुनगुनाते सुना जबकि वे पूरी तरह धूल में लथपथ थे l वे यह कहते जारहे थे:

(अल्लाह की क़सम यदि अल्लाह न होता तो हम मार्ग न पाते, और न दान करते न रोज़ा रखते, तो तू हम पर शांति उतार l और यदि हम जंग करते हैं तो तू हमारे पैरों को जमा दे l निस्संदेह उन लोगों ने हम पर चढ़ाई की है और जब वे दंगा करना चाहते हैं तो हम इनकार करते हैं l)
तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- भी उनके साथ "अबैना" "अबैना" कहते जाते थे l[1]  

इसी तरह जब कोई उनके साथ मज़ाक़ करता था तो वह उसका साथ देते थे और हँसते मुस्कुराते थे l 

एक बार हज़रत उमर-बिन-ख़त्ताब हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- के पास आए तो देखा कि अपनी पवित्र पत्नियों पर नाराज़ हैं, क्योंकि वे अधिक ख़र्च की मांग कर रही थीं, तो उमर ने अपने मन में कहा कि मैं ज़रूर हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-को हंसाऊंगा, इस के बाद उन्होंने कहा: हे अल्लाह के पैगंबर! आपको याद होगा कि हम क़ुरैश के लोग महिलाओं को दबा कर रखते थे, और हमारी स्थिति यह थी कि यदि हम में से किसी की पत्नी ख़र्च मांगती थी तो आदमी उठ कर उसका गला पकड़ कर दबाता था l किन्तु जब हम मदीना आए तो देखे कि यह लोग तो ऐसे हैं कि इनकी महिलाएं मर्दों को दबा कर रखती हैं तो हमारी महिलाएं उनकी महिलाओं से सीखने लगीं l इस पर हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-मुस्कुराए तो हज़रत उमर और बात को आगे बढ़ाए तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-की मुस्कुराहट और ज़ियादा हो गई l  
बल्कि कुछ हदीसों में आप पढ़ेंगे कि वह इतना मुस्कुराए कि उनके दांत दिख गए l वह कितना महान है जिसने उनको ऐसा अंदाज़ सिखाया:

" وإنك لعلى خلق عظيم "( القلم:4)

 

"निस्संदेह आप एक महान नैतिकता के शिखर पर हैं" (अल-क़लम: ४)

 

لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَة (الأحزاب:(21)


"निस्संदेह तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में एक उत्तम आदर्श है l"(अल-अहज़ाब:२१)
हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-विभिन्न प्रकार के लोगों से अच्छी तरह निपटते थे,ऐसे लोग जो ऊँचे बर्ताव को समझ भी नहीं सकते थे और न जो घुलमिल सकते थे बल्कि जो अपने आप में रहते थे और जल्दबाज़ी से काम लेते थे उनके साथ भी अच्छा चलते थे और सह लेते थे l  

एक दिन हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- एक स्थान पर उतरे जिसको "जेइररअना" कहा जाता है, और जो मक्का और मदीना के बीच स्थित है, उनके साथ हज़रत बिलाल थे l इतने में एक देहाती उनके पास आगया यूं लगता है कि उसने हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-से कुछ माँगा था और उन्होंने उसे देने का वादा किया था किन्तु उस समय तक मुहैया नहीं हो पाई थी l और उस देहाती को जल्दी थी तो उसने कहा: हे मुहम्मद! तुम ने जो देने का वादा किया है क्या उसे पूरा नहीं करोगे?
तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- ने उसे नरमी और प्यार से कहा:ख़ुश हो जाओ l क्या इस से भी अधिक नरम कोई शब्द है? इस पर भी उस देहाती आदमी ने कठोर अंदाज़ में कहा:"ख़ुश हो जाओ":"ख़ुश हो जाओ" बहुत होगया l तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-उसकी बात से नाराज़ हुए किन्तु उन्होंने अपना ग़ुस्सा पी लिया, और वह अबू-मूसा और बिलाल की ओर पलटे जो उनके बग़ल में ही बैठे थे और कहा: इसने तो ख़ुशखबरी को ठुकरा दिया तो तुम दोनों इसे स्वीकार कर लो l तो वे दोनों ख़ुश होगए l इस के बाद हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-एक पियाला पानी मंगवाए और उसमें अपने दोनों हाथ और मुंह धोए और उस में कुल्ली किए और उन दोनों को कहा इसे पी लो और अपने अपने चेहरे और गर्दन पर डाल लो और ख़ुश हो जाओ, मतलब इस पानी के आशीर्वाद से ख़ुश हो जाओ l
तो वे दोनों उस पानी को ले लिए और वैसे ही किए जैसे उनको आदेश दिया गया था l उम्मे-सलमा-अल्लाह उनसे ख़ुश रहे- भी वहीँ एक पर्दे के पीछे बैठीं थीं, और इस आशीर्वाद में हिस्सा लेना चाहती थी, इसलिए वह पर्दे के पीछे से आवाज़ दी, तुम दोनों ज़रा अपनी मां केलिए भी बचा रखना, मतलब उम्मे-सलमा केलिए कुछ बचाओ !
तो वे कुछ पानी रहने दिए और उनके पास भेज दिए, तो उन्होंने भी उस पानी को लेकर वही किया जो करने को कहा गया था l [2]
जी हाँ हमारे प्यारे,हमारी आँखों के ठंडक पैगंबर हज़रत मुहम्मद-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-बहुत ही अच्छी बैठक वाले थे, उनके साथ बैठने से दिल बहल जाता था, वह सब कुछ सह जाते थे, बात बात पर  समस्या नहीं बनाते थे l

एक बार हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-हज़रत आइशा-अल्लाह उनके साथ ख़ुश रहे-के साथ बैठे थे तो वह महिलाओं से संबंधित कहानियाँ कहना शुरू करदी l
और वह ध्यान से उनकी बात सुनने लगे और उनका साथ देने लगे , और वह बिल्कुल लंबी कहानी आराम से कह रही थीं, और  हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- अपनी व्यस्त जीवन के बावजूद भी उनकी बातों को सुन रहे थे और उनके हाँ में हाँ भी मिला रहे थे और साथ ही टिप्पणी भी करते जा रहे थे यहाँ तक कि उन्होंने अपनी पूरी कहानी समाप्त करली l 
हज़रत आइशा की कहानी यह थी कि इस्लाम आने से पहले अज्ञानता के दिनों में ग्यारह महिलाओं की एक सभा हुई, उस सभा में सब ने एक दूसरे के साथ यह वादा किया कि अपने अपने पतियों के विषय में कोई भी बात नहीं छिपाएगी, सब साफ़ साफ़ खोल कर रख देगी, 

इस के बाद सब अपने अपने पति के बारे में बात करने लगी और उस में कोई झूट शामिल नहीं की l

पहली महिला ने कहा:
"मेरा पति पहाड़ की चोटी पर पड़े ऊंट के बेकार मांस की तरह है l

न तो आसान है कि चढ़ जाए, और न तो मांस अच्छा और मोटा है कि उसे नीचे उतारा जाए l  
वह अपने पति को कठिन पहाड़ की तरह बता रही है, जिस पहाड़ के ऊपर एक बड़े ऊंट का बेकार मांस पड़ा है, और कोई भी आदमी वहाँ चढ़ना नहीं चाहता है, क्योंकि वहाँ तक चढ़ना एक कठिन काम है l
इसी तरह उसके लिए इतने थकान की भी ज़रूरत नहीं है l  मतलब वह आदमी बुरी आदत का है और गर्व करने वाला है हालांकि उसके पास गर्व केलिए कोई गुण नहीं है,क्योंकि वह तो कंजूस और ग़रीब है l
दूसरी महिला ने कहा:
यदि मैं उसके दोष का वर्णन शुरू करूँ तो मुझे छोड़ देने का डर है, और यदि मैं कहूँ तो उसकी सारी ख़राबियों और कमियों को एक एक करके गिन कर रख दूँ l 
मतलब यह है कि उसका पति ग़लतियों का समुद्र है, और उसे डर भी है कि यदि उसके ख़िलाफ कुछ बोली और उसके पति को ख़बर मिल जाए तो वह उसे तलाक़ दे देगा जबकि वह बच्चों के कारण उस से दूर नहीं रह सकती है l
तीसरी महिला ने कहा:
मेरा पति एक लंबा आदमी है l यदि मैं उसके ख़िलाफ बोलूं तो वह मुझे तलाक़ दे देगा और यदि मैं चुप रहूँ तो लटकी रहूँ l और वह तो बिल्कुल तेज़ तलवार है l

मतलब: उसका पति लंबा और भद्दा रूप का है, और बहुत अशिष्ट है l
वह कभी उसके दोष को अनदेखी नहीं कर सकता, बल्कि एक तलवार के धार की तरह है l उसे लगातार और हर घड़ी तलाक़ का डर है l उसका पति उसका एक शब्द भी सह नहीं सकता है  यदि वह कोई शिकायत करेगी तो वह उसे तलाक़ दे देगा l और वह पति की तरह उसके साथ बर्ताव भी नहीं करता है l इसलिए, वह बीच में लटकी हुई है l
चौथी महिला ने कहा:
मेरे पति तिहामा की रात की तरह हैं न ही गर्म और न ही ठंडा न कोई डर और न कोई बेज़ारी l

तिहामा की रात अच्छी होती थी उसमें न तो तेज़ हवा चलती थी और न ही धूल उड़ता था , इसलिए वहाँ के निवासियों के लिय रात काफी सुखद होती थी l वह अपने पति को अच्छे बर्ताव और मध्यम शिष्टाचार वाला बता रही है l जिस से कभी उसे कोई चोट नहीं पहुँचती है l
पांचवीं महिला ने कहा:
मेरे पति, जब घर में प्रवेश करते हैं तो एक तेंदुए की तरह हैं, और

जब बाहर निकलते हैं तो एक शेर हैं, वे चीज़ों के बारे में ज़ियादा पूछगछ नहीं करते हैं l
मतलब, जब वह घर में आते हैं तो एक एक तेंदुए की तरह बर्ताव करते हैं, तेंदुए को उदार और सक्रिय माना जाता है l और जब  वह घर से निकल कर लोगों से मिलते हैं तो बहादुरी के साथ एक शेर की तरह बर्ताव करते हैं l और वह नरम स्वभाव वाले भी हैं इसलिए परिवार क्या ख़र्च करते हैं या क्या देते-लेते हैं उसके विषय में ज़ियादा पूछगछ नहीं करते हैं l

छठी महिला ने कहा:
मेरा पति तो जब खाता है तो सब समेट लेता है, और जब वह पीता है तो सब घोंट जाता है, और जब सोता है तो सारी चादर को खींच कर ख़ुद सब ओढ़ लेता है, और किसी दुख के समय उँगलियों से नब्ज़ भी नहीं देखता है l

मतलब: उसका पति बहुत बड़ा पेटू है कि  सब खा जाता है और अपने
परिवार केलिए कुछ भी रहने नहीं देता है l इसी तरह बहुत बड़ा पियक्कड़ है जब पीता है तो सब पी जाता है, और जब सोता है तो सारा कंबल खींच कर ख़ुद ओढ़ लेता है, और अपनी पत्नी केलिए कुछ नहीं छोड़ता है, और जब वह दुखी रहती है तो वह उसका कुछ ख्याल नहीं रखता है, न हाथ लगा कर देखता है और न दुख का कारण पूछता है l
सातवीं महिला ने कहा:
मेरा पति एक ढीठ और मूर्ख आदमी है l सभी दोष उस में पूरी तरह से उपस्थित है l यदि तुम उससे बात करो तो बात नहीं मानेगा और अपमान या गालीगलौज पर उतर आएगा l
और यदि तुम उसके साथ मज़ाक करो तो  तुम्हारा सिर फोड़ देगा l या तुम्हारे शरीर को घायल कर देगा, या अंधाधुंध मारेगा जहाँ लगना हो लगे l  
आठवीं महिला ने कहा:
मेरे पति छूने में एक ख़रगोश की तरह नरम हैं, और"ज़र्न्ब"(अच्छी महक की एक बूटी) की तरह ख़ुशबूदार हैं, वह मेरी मुठ्ठी में रहते हैं जबकि लोग उसकी मुठ्ठी में रहते हैं l मतलब वह अपनी पत्नी की बात मानता है, किन्तु वह बहादुर है लोगों को अपने क़ब्ज़े में रखता है, और वह एक मज़बूत व्यक्तित्व का मालिक है l  

नौवीं महिला ने कहा:
मेरे पति एक उदार और दाता आदमी हैं उनका घर बड़ा और विशाल है और अतिथियों केलिए सदा उसका दरवाज़ खुला है, उनके घर में बहुत राख जमा होता है l यानी उनके घर में सदा आग जलती रहती है और अतिथियों केलिए सदा खाना पकता रहता है l उनका घर सार्वजनिक बैठक के बिल्कुल नज़दीक है, मतलब वह अपने दोस्तों से मिलता है किन्तु अपने परिवार से भी दूर नहीं होता है, बल्कि सादा उनका ख्याल रखता है l और यदि वह किसी का मेहमान होता है तो भर पेट नहीं खता है l और यदि रात में दुश्मन, आदि का कोई डर हो तो रात भर नहीं सोता है और देखभाल करता है l
दसवीं महिला ने कहा:

मेरे पति "मलिक" हैं, और मलिक क्या हैं? मलिक बहुत सारी भलाई के मालिक हैं l उनके पास ऊंटों के रेवड़ हैं, उनके यहाँ ऊंट बैठते तो बहुत हैं किन्तु चराई केलिए केवल कुछ ही जाते हैं l जब उनके ऊंट छुरी की झंकार सुनते हैं तो उनको विश्वास हो जाता है कि वे अब बचने वाले नहीं हैं l  
मतलब, उसके पति का नाम मलिक है उनको कितना भी सराहोगे तो उनके गुणों को गिन नहीं पाओगे l उनके ऊंट सदा उसके पास ही रहते हैं बल्कि चरने केलिए भी नहीं नकलते हैं, ताकि दूध देने केलिए या मेहमानों केलिए ज़बह केलिए सदा तैयार रहें l
और जब ऊंट छुरी तेज़ करने की आवाज़ सुनते हैं तो उन ऊँटों को विश्वास होजाता है, कि अब कुछ ऊंट मेहमानों केलिए ज़बह होंगे l

ग्यारहवीं महिला ने कहा:
मेरे पति अबू-ज़रअ हैं या उनका नाम अबू-ज़रअ है l क्या आपको पता है कि अबू-ज़रअ कौन हैं?  

उन्होंने गहनों से मेरे कानों को भार दिया है, मतलब ग़हने ज़ेवर उस पर लाद दिया l
और उन्होंने मेरी बाहों को चरबी से भर दिया और उसके पास आकर में मोटी हुई, उसने मेरी इतनी बड़ाई की कि मुझे ख़ुद पर गर्व महसूस होने लगा l वह मुझे एक छोटी सी बकरी के परिवार में पाया था जहाँ मुशकिल से एक छोटी सी बकरी दिखाई देती थी l मतलब: उनके मातापिता ग़रीब थे जिनके पास मात्र एक दो छोटी छोटी बकरियां रहती थीं l तो मेरे पति ने मुझे एक सम्मानित परिवार में लाकर रख दिया, जहाँ घोड़ों और ऊंटों की आवाज़ का शोरशराबा है l और खलिहान में सदा घोड़ों और ऊंटों के द्वारा अनाज की सफ़ाई का काम चलता रहता है l और जब मैं बोलती हूँ तो कोई रोकटोक नहीं होता है, मतलब वह जो  चाहती है बात करती है कोई आलोचना  नहीं होती है l
और मैं सोती हूँ तो सुबह देर तक सोती रहती हूँ l मतलब:जी भर कर दिन निकलने तक सोती है क्योंकि नौकर और ग़ुलाम से घर भरा है l  
और जब मैं पीती हूँ तो जी भर कर पीती हूँ क्योंकि हर प्रकार के पीने की चीजें पड़ी हैं l
अबू-ज़रअ की माँ के बारे में मत पूछो l और अबू-ज़रअ की माँ कौन हैं? वह एक अच्छी मोटी-ताज़ी महिला हैं l
और उनका घर विशाल और चौड़ा है l

अबू-ज़रअ के पुत्र के बारे में मत पूछो l अबू-ज़रअ का पुत्र कौन हैं?
अपने बिस्तर पर नरम नरम सोता है l
और थोड़ा ही खाता है l

अबू-ज़रअ की बेटी के बारे में मत पूछो l अबू-ज़रअ की बेटी कौन है?

वह अपने पिता और अपनी माँ का आज्ञाकार है l
और परदे में रहती है l
और उनकी हमजोलियों को उनसे सदा जलन है उसकी सुंदरता और आनंद जीवन के कारण l

अबू-ज़रअ की नौकरानी के बारे में मत पूछो l अबू-ज़रअ की नौकरानी कौन हैं?

वह घर की बात बाहर नहीं करती है l

और घर के खाने की चीज़ों को बरबाद नहीं करती है l

घर को कभी गंदा नहीं रखती है l 
इसके बाद बोली: एक दिन ऐसा हुआ कि अबू-ज़रअ निकला जब वसन्त का समय था, तो उसे एक औरत मिली जिसके साथ तेंदुओं की तरह मोटे मोटे, मज़बूत और सुंदर दो बेटे थे l वे दोनों उसके स्तनों के साथ खेल रहे थे, उसे देख कर वह मुझे तलाक़ दे दिया और उससे शादी करली l
उसके बाद मैं एक महान आदमी से शादी करली l जो एक तेज़ घोड़े पर सवार होता है ,और उसके हाथ में एक भाला रहता है, उसने मुझ पर उपहारों और तुहफ़ों  की बरसात करदी l  
उसने मझे हर प्रकार की इत्र और ख़ुशबू की एक जोड़ी दी l ताकि ख़ुद भी रखूं और रिश्तेदारों को भी दूँ l
उसने मुझे यह भी कहा: हे उम्मे-ज़रअ ख़ुद भी खाओ और अपने रिश्तेदारों को भी दो l

महिला ने आगे कहा: यदि मैं इन के दिए सारी चीज़ों को इकठ्ठा करूँ तो भी अबू-ज़रअ के एक छोटे से बरतन के बराबर नहीं होगी l

सही बात यह है कि उसका दिल अभी तक अबू-ज़रअ पर लगा हुआ है l कहावत में है: "प्यार तो सब से पहले वाले दिलबर का है l"   
कहानी समाप्त होगई l किन्तु ग्यारह महिलाओं के बारे में यह एक लंबी कहानी थी l अनुमान लगाइए कि इस में हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो-का कितना समय लगा? किन्तु वह अपनी प्यारी पत्नी और जीवन साथी मोमिनों की माता हज़रत आइशा- अल्लाह उनसे ख़ुश रहे- से कहानी सुनते रहे , ध्यान से सुनते रहे, साथ देते रहे, और अश्चर्य भी दिखाए, और वह अपनी कहानी आराम से सुनाती गई l उन्होंने उबने या थकने का कोई संकेत नहीं दिया और न कामों और समस्याओं की कोई शिकायत की l

जब हज़रत आइशा-अल्लाह उनसे ख़ुश रहे-अपनी कहानी पूरी कर ली तो हज़रत पैगंबर-उन पर ईश्वर की कृपा और सलाम हो- ने साथ देने केलिए ध्यान दिखाने केलिए और यह बताने केलिए कि उन्होंने पूरी कहानी को ध्यान से सुन लिया है, और उन्होंने कहानी से अपने ध्यान को दूर नहीं रखा l उन्होंने कहा: मैं तुम्हारे लिए ऐसे ही हूँ जैसे अबू-ज़रअ उम्मे-ज़रअ केलिए था l

याद रहे यदि आपका बेटा एक खूबसूरत परिधान पहन कर आपके सामने आता है और कहता है: प्रिय पिताजी! कैसा लग रहा हूँ? तो आप उसे सकारात्मक उत्तर दीजिए और कहिए: सुबहानललाह! क्या बात है! क्या सुंदरता है!
आपकी बेटी, पत्नी, पति, बेटा या सहयोगी सब के साथ बल्कि अपने मिलनेवाले लोगों के साथ सदा घुलमिल कर रहिए l हो सकता है,
कभी कभी आपको घटना याद न हो, और एक व्यक्ति ने आपको कह दिया एक ख़ुशखबरी है! मेरे पिता बीमारी से ठीक होगए l तो आप हरगिज़ यह मत कहिए: बल्कि यूँ कहिए अलहम्दुलिल्लाह अल्लाह का शुक्रिया है अल्लाह उन्हें पुण्य के साथ अच्छा स्वास्थ्य दे, तुमने मुझे इस ख़बर से ख़ुश कर दिया, अल्लाह आप को भी ख़ुश रखे l
या, यदि किसी ने कहा:मेरा भाई जेल से छुट गया है l तो आप हरगिज़ यह मत कहिए अरे मुझे तो पता ही नहीं था कि वह जेल में थे, उसके बदले आप यूँ कहिए अलहम्दुलिल्लाह अल्लाह का शुक्रिया है, इस बात से ख़ुशी हुई, अल्लाह सदा आप केलिए खुशियां ही खुशियां रखे l   

अन्त में, प्रिय लोगो! याद रखिए, प्रोत्साहन और सकारात्मक उत्तर  
जानवरों के साथ भी काम आता है l  
अबू-बक्र अल-रक्की ने कहा: मैं रेगिस्तान में था तो वहां मेरी भेंट अरब की एक जनजाति से हुई, उनमें से एक आदमी ने मुझे अपने पास अतिथि  बना लिया, और मुझे अपने तम्बू में ले गया, तो मैंने वहां एक काले रंग के ग़ुलाम को जंजीरों में बंधा हुआ देखा l  
और घर के सामने कई ऊंट मरे पड़े थे केवल एक ऊंट बचा था और वह भी बिल्कुल दुबला और कमज़ोर था जैसे अभी अभी मरने वाला है l तो उस ग़ुलाम ने मुझ से कहा: आप यहाँ मेहमान हैं और आपका एक अधिकार है, इसलिए आप अपने मेज़बान और मेरे मालिक के पास मेरी सिफारिश कर दिजिए, वह अपने मेहमानों की बात नहीं उठाते हैं और वह आपकी सिफ़ारीश को हरगिज़ नहीं ठुकराएंगे, और शायद वह इन जंजीरों को खोल देंगे l
मैं चुप रहा, मैं नहीं जानता था कि उसके अपराध क्या थे l जब वे भोजन लाए, तो मैं खाने से इनकार कर दिया और कहा: मैं उस समय तक नहीं खाऊंगा जब तक मैं इस ग़ुलाम केलिए सिफारिश न कर लूँ l इस पर मालिक ने कहा: इस ग़ुलाम ने मुझे ग़रीब बना दिया है, और उसने मेरी सारी संपत्ति को नष्ट करके रख दिया l  मैंने पूछा:आख़िर बात क्या है?
उन्होंने कहा:बात यह है कि उसकी आवाज़ बहुत ही मीठी और सुंदर है l और मेरी रोज़ीरोटी इन ऊंटों पर आधारित है l
 किन्तु इसने उन ऊंटों पर बहुत भारी भारी बोझ लाद दिया l और बहुत ही सुंदर और सुरीली आवाज़ में कविता गाना शुरू कर दिया और ऊँटों को अपनी मीठी मीठी आवाज़ सुना कर तीन रातों की यात्रा एक ही रात में तय कर लिया, और जब उसने उन ऊंटों पर से बोझ उतारा तो उतारते ही वे सारे के सारे मर गए, सिवाय इस एक ऊंट के, किन्तु आप मेरे मेहमान हैं, और आपका मेरे दिल में एक सम्मान है, इसलिए यह ग़ुलाम आपको उपहार में देता हूँ, और ग़ुलाम को जंजीरों से मुक्त कर दिया l  
अबू-बक्र अल-रक्की ने कहा: यह सुन कर मैं उसकी आवाज़ सुनने केलिए इच्छुक होगया l अगली सुबह को मैंने उससे कहा कि इस ऊंट केलिए ज़रा गाना गाओ, और उस कुआं से पानी लाओ, ताकि ऊंट चुस्त हो जाए l
तो वह ग़ुलाम एक सुंदर आवाज़ में गाना शुरू किया और जब उसने  अपनी आवाज़ उठाई और जब ऊंट ने उसकी आवाज़ सुनी तो बिल्कुल मस्त होगया और नाचने झूमने लगा, बल्कि मस्ती से अपने आप को ही भूल गया, और रस्सी को तोड़ दिया, और मैं भी उसकी सुंदर आवाज़ को सुन कर चेहरे के बल गिर गया, मुझे नहीं लगता था कि मैंने कभी भी ऐसी सुंदर और मीठी आवाज़ सुनी होगी l[3]
जी हाँ जानवर भी मीठी और सुरीली से प्रभावित होते हैं, इसलिए एक ग़ुलाम अपनी आवाज़ को बनाता सवांरता था तो फिर मनुष्य के बारे में क्या कहना l
अपने आप को प्रशिक्षण के द्वारा विकसित कीजिए l
जिंदा रहो मरा हुआ मत रहो l  अपनी बात और चेहरे के इशारों को भी काम में लाइए और लोगों के साथ घुलमिलकर रहिए, ताकि दूसरों को आपके साथ सहज महसूस हो l



[1] असल में"अबैना" उस कविता का अंतिम शब्द था जिसको वे दोबारा कहते थे l

[2]  इसे बुख़ारी और मुस्लिम ने उल्लेख किया है l

[3] इहया उलूम-अल-दीन[२: २७५}

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